classification of crops in hindi भारतीय फसलें और उनका वर्गीकरण | Indian Crops and Classification

classification of crops in hindi भारतीय फसलें और उनका वर्गीकरण | Indian Crops and Classification . फसलों का वर्गीकरण: खरीफ, रबी एवं जायद . भारत में फसल कितने प्रकार की होती है. भारत में फसलें – भारत में विभिन्न प्रकार की फसलों के बारे में जानें! Classification of crops in hindi with examples

विभिन्न आधारों के अनुसार फसलों का वर्गीकरण किया जाना कठिन कार्य है फिर भी फसलों के वर्गीकरण के लिए निम्न बिन्दुओं को आधार बनाया जा सकता है:

  1. ऋतुओं को आधार मानकर,
  2. फसल की उपयोगिता के आधार पर
  3. वनस्पतिक वर्गीकरण।

3.1 ऋतुओं के आधार पर वर्गीकरण आदिकाल से विभाजन होता आ रहा है।

(अ) खरीफ की फसलें : वर्षाकाल में बोई जाने वाली करालों को खरीफ अप्तु की फसल का नाम दिया गया है। वर्षा में अधिकतर उन फसलो की दुलाई की जाती है जो उष्णता तथा अधिक आद्रता है बोधी जाती है। सिंचाई की उपयुक्त सुविधा नहीं होने के कारण वर्षा पर निर्भर रहना पड़ा है। सरीक की बुआई का समय ध्यान से जुलाई तक पहता है सिंचित क्षेत्रों में फसल की बुआई मध्य मई से जून के नाम सप्ताह तक कर दी जाती है प्यार, बाजरा, मक्का गा गूंग, सोयाबीन, कपास, मूगफली जुट, सोनिया आदि प्रमुख खरीफ फसलें है।

(ब) रबी की फसलें : रबी में बोई जाने वाली फसलों में जौ, गेहूं, चना मटर पाई, सरसी, बरसीम रिजवा आलू आदि प्रमुख है। इन फसली की बुआई का समय सितम्बर के अन्तिम सप्ताह से दिसम्बर कम तक चलता है। रबी में अधिकतर उन फसलों की बुवाई की जाती है जो कम ताप तथा शुक मौसम में बुवाई जाती है।

(स) जायद की फसलें : इस वर्ग की फसलों में ताप तथा आर्द्रता सहन करने की क्षमता पायी जाती है। इन फसलों में लू एवं सूखा सहन करने की क्षमता भी पायी जाती है। इन फसलों की बुआई फरवरी मध्य से मार्च मध्य तक करते है। इस ऋतु की मुख्य फसलों में खरबूजा, ककड़ी, मूंग आदि है।

3.2. उपयोगिता के आधार पर वर्गीकरण उपयोगिता के अनुसार फसलों को वर्गीकृत किया जा सकता है। विभिन्न फसलों को उगाने के उद्देश्य अलग-अलग हो सकते है। कुछ फसलें ऐसी भी है जिनको अलग-अलग स्थानों पर अलग अलग उपयोगिता के लिये बोया जाता है। जैसे बाजरे की फसल को सिंचित क्षेत्रों में चारे की फसल के लिए बोया जाता है तथा रेगिस्तान में इनको अन्न वाली फसल के रूप में बोया जाता है।

खाद्यान्न फसलें : इन फसलों का उपयोग, मनुष्य द्वारा अन्न के रूप में खाने के लिए किया जाता है। इनका बीज खाने के लिए उपयोग में लिया जाता है बीज में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, क्सा आदि प्रचुर मात्रा में मिलने के कारण मनुष्य ने बीजों वाली फसल को खाद्यान्न अथवा अनाज कहा। जैसे गेहूं, चना, मक्का, बाजरा, जी, सांवा, कौदी आदि

(ii) दलहनी फसलें: इस वर्ग की फसलों का मुख्य उद्देश्य मनुष्य के लिए शाकाहारी प्रोटीन की

उपलब्धता से लिया गया है। पौधों के माध्यम से प्रोटीन की उपलब्धता दलहनी फसलों से होती है जो बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकता के लिए आवश्यक माना गया है। इन फसलों में वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को ग्रहण कर रसायनिक ऊर्जा के लिए सुरक्षित रखने का गुण पाया जाता है। इसलिए इनके बीजों में प्रोटीन की मात्रा अधिक होने के कारण, प्रोटीन का अच्छा स्रोत माना गया है। इस वर्ग में चना, मूंगफली, मूंग, अरहर, उड़द, मटर आदि फसलों को रखा गया है।

(iii) तेल वाली एवं तिलहन फसलें : इन फसलों के बीजों में तेल की मात्रा अधिक पायी जाती है। इनके

बीजों से तेल निकालकर खाने के उपयोग में लिया जाता है। इन बीजों में 40-55 प्रतिशत के लगभग

तेल की मात्रा पायी जाती है इनमें मूंगफली, सरसों, तोरिया, सूरजमुखी, अलसी, कुसुम आदि प्रमुख फसलें

है।

(iv) रेशेदार फसलें : जिन फसलों से मनुष्य को रेशा प्राप्त होता है एवं इस रेशे से कपड़ा, धागा, टाट आदि का निर्माण किया जाता है इस वर्ग में कपास, जूट, पटसन, सनहैम्प आदि फरालों को रखा गया है।

(v) चारे वाली फसलें : इन् फसलों के हरे भाग को चारे के उपयोग में लिया जाता है। हरे भाग को जड़ों से 5-6 सेमी. ऊपर से काटकर, फसल में सिंचाई कर दिये जाने पर जड़ों में दये तने बनाने की क्षमताऐं पायी जाती है। इस गुण के कारण इनको हरे चारे के काम लिंया जाता है एवं 2-3 कटाई पश्चात् अन्न उत्पादन भी लिया जा सकता है। इन फसलों में बाजरा, मक्का, ज्वार, लोबिया, बरसीम आदि प्रमुख है।

(२) शर्करा वाली फसलें : इन फसलों से मनुष्य को चीनी, गुड़ आदि प्राप्त होते है। इन फसलों में सुक्रोज एवं ग्लूकोज की मात्रा अधिक पायी जाती है। इन फसलों में गन्ना, चुकन्दर आदि को रखा गया है।

(vii) सब्जी की फसलें : इनको लम्बे समय तक साधारण परिस्थितयों में संग्रडित नहीं किया जा सकता है। इनमे पत्तों, जड़ों, तनों, फलों आदि को सब्जी बनाकर (पकाकर) या कच्चा खाया जा सकता है। इनसे मानव को अधिक मात्रा में जल्दी ऊर्जा प्राप्त होती है। इस वर्ग में मूली, गाजर, टमाटर, आलू, अरबी, चुकन्दर, मटर, शलजम आदि फसलों को रखा गया है।

(viii) फल वाली फसलें : फल वाली फसलों में पपीता, केला, सेव, सन्तरें आन, चीकू आदि प्रमुख है जिनको कच्चा, धोकर साफ करने के पश्चात खाने के काम लिया जाता है। इनसे कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटागिन्स आदि प्राप्त होते है।

(ix) उत्तेजना उत्पन्न करने वाली फसलें : इस वर्ग की फसलों में चाय, कॉफी, अफीम, तम्बाकू आदि को रखा गया है। इनके सेवन करने पर उत्तेजना बढ़ाती है।

(x) मसालें वाली फसलें : जिन फसलों को खुशबू एवं स्वाद के लिए बीजो, पत्तियों आदि का सेवन किया जाता है इनका उपयोग सब्जियों में विभिन्न तरह की खुशबु लाने के लिए किया जाता है, इनमें धनियाँ, जीरा, मिर्च, अदरक, काली मिर्च, इलायची, सौंफ, हल्दी आदि प्रमुख फसलें है।

(xi) जड़ तथा ट्यूबर की फसलें : इन फसलों की जड़ों एवं कन्दों को खाने के उपयोग में लिया जाता है। इनमें अत्यधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स पाये जाते है। इन फसलों में आलू, शलजम, मूली, अदरक, शकरकन्द आदि प्रमुख फसलें है।

(xii) औषधीय फसलें : इस वर्ग की प्रमुख फसलों में हल्दी, पौदीना, अदरक, लहसून आदि है। जिनका उपयोग विभिन्न औषधियों में किया जाता है।

(xiii) हरी खाद की फसल : मृदा में उर्वरता एवं कार्बनिक पदार्थों की मात्रा को बढ़ाने के लिए, दलहनी तथा अदलहनी फसलों को बोया जाता है। दलहनी फसलों द्वारा वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को मृदा में स्थिर कर पौधों को उपलब्ध कराने की प्रक्रिया के कारण इन्हें हरी खाद के लिए उगाया जाता है। इनको फूल आने के समय गहरी जुताई के साथ मृदा में दबा दिया जाने से, मृदा की उर्वरा शक्ति को बनाये रखना, जल अपरदन को रोकना, जिससे मृदा में नमी की अधिकतम मात्रा बनी रहें। इसक लिए मूंग, सनई, लोबिया, बरसीम, मक्का, बाजरा आदि फसलों का प्रमुखता से उपयोग किया जाता है।

(xiv) मृदा आरक्षक फसलें : मृदा में पानी, हवा आदि के माध्यम से होने वाले नुकसान से बचाव के लिए एवं नमी की मात्रा को बनायें रखने के लिए कुछ फसलों को उगाया जाता है इनमें मोठ, मूंग, बरसीम आदि फसलों का उपयोग किया जाता है इनका फैलाव मृदा की ऊपरी सतह पर अधिक होने के कारण वायु के द्वारा होने वाले नुकसान को रोकना एवं मृदा में जल संरक्षण को बढाया जाना होता है।

(xv) नगदी फसलें : फसलों को लम्बे समय तक संग्रहित नहीं किया जाकर, पकने के पश्चात् बाजार में बेचना अनिवार्य हो जाता है। इनको नगदी के रूप में देखा गया है। इन फसलों में गन्ना, आलू, चुकन्दर, बरसीम आदि को रखा गया है।

(xvi) अन्तर्वर्ती फसलें : प्राकृतिक करणों के चलते हुए मुख्य फसल का नष्ट होना अथवा फसल की बुआई में अधिक विलम्ब होना, ऐसी स्थितियों में फसल को तैयार किया जाना कठिन होता है, अन्य फसल जिनको आसानी से बोया जाकर, उत्पादन लिया जा सकता है. कैंच क्रोप का नाम दिया गया। इनमें मूंग, मोठ, सरसों, आलू आदि प्रमुख फसलें है।

(xvii) कीट आकर्षक फसलें : कभी-कभी मुख्य फसल को कीटों एवं रोगों से बचाने के लिए, खेत के चारों और एक कतार में (बाहर की ओर) दूसरी फसल की बुआई कर मुख्य फसल की बुआई इसके अन्दर की ओर की जाती है। उदाहरण के तौर पर कपास की फसल का लाल कीट से बचाव करने के लिए कपास के खेत में बाहर की ओर भिण्डी की कतार में बुआई करते है जिससे कपास की फसल में लाल कीट का आक्रमण कम होता है। इस तरह भिण्डी की फसल को ट्रेप क्रोप कहा जा सकता है।

(xviii) मिश्रित सहयोगी फसलें : इस वर्ग के अन्तर्गत दोनों फसलों के बीजों को एक साथ नहीं मिलाकर अलग-अलग बोया जाता है जैसे सरसों की दो पंक्तियों के साथ गेहूं की छः पंक्तियां। अरहर के साथ खरीफ में ज्वार तथा मक्का की फसल तथा रबी में चन्ने की फसल ले सकते है। तारामीरा या सरसों की फसल भी अरहर के साथ रबी में ली जा सकती है। सरसों के साथ चने की चार पंक्तियाँ तथा मूंग, उड़द के साथ मक्का या कपास की फसल की 6-7 पंक्तियाँ ली जा सकती है। इस तरह फसलों की बुआई करने से फसलों की निराई-गुड़ाई करना एवं कटाई किया जाना सरल हो जाता हैं। दोनों फसलों के पौधों में उचित दूरी होने के कारण पौधों की वृद्धि पर भी प्रभाव नहीं पड़ता है।

(xix) सीमान्त फसलें : मुख्य फसल के साथ-साथ सुरक्षा के लिये गौण फसल की बुआई करते है। जैसे गन्ने के साथ-साथ चारों ओर सनहैम्प, अरहर या कैंचा की फसल को बोना।

(xx) सहायक फसलें : मुख्य फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए, गौण फसलों को साथ मिलाकर बुआई की जाती है। उदाहरण के तौर पर बरसीम के साथ सरसों की फसल का बोया जाना। बरसीम की पहली कटाई के साथ सरसों की फसल पककर तैयार हो जाने से, बरसीम की पहली कटाई के साथ-साथ ही उत्पादन में काफी वृद्धि हो जाती है। इस तरह बरसीम के साथ-साथ सरसों की उपज भी मिल जाती है।

(xi) समानान्तर फसलें : अरहर के साथ मूंग, मोठ, उदड़, लोबिया को कम अवधि की जातियाँ उगाना ही समानान्तर खेती कहलाती है। इन फसलों से अरहर की उपज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इससे अरहर की पैदावार के अतिरिक्त इन फसलों से 6-10 क्विंटल प्रति हैक्टर उपज मिलने से आय में वृद्धि होती है।