composition of soil in hindi मिट्टी की संरचना Soil Structure in hindi

composition of soil in hindi मिट्टी की संरचना Soil Structure in hindi . What is the structure of a soil? Soil Texture and Soil Structure .

मृदा संरचना (Soil Structure)

मृदा का संरचना जानना इसलिए आवश्यक हो जाता है जिससे कि मृदा की उत्पादन क्षमता का ज्ञान, मृदा आकारकीय स्थिति आदि का अध्ययन किया जा सकें। इसरो मृदा के कणों की वास्तविक क्षमता का ज्ञान भी होता है।

मृदा संरचना से मृदा संरचना, मृदा पारगम्यता, मृदा आभाषी धनत्व, वायु प्रतिशतता आदि सभी प्रभावित होते है। आभाषी घनत्व वायु प्रतिशतता आदि सभी प्रभावित होते है।

किसानों द्वारा अपनी मृदा में कार्बनिक खाद मिलाया जाना, उर्वरकों का उपयोग अत्यधिक करना, पानी का असमान उपयोग करना, मृदा में जिप्सम का उपयोग आदि सभी कृषक क्रियाओं के द्वारा मृदा की संरचना प्रभावित होती है।

मृदा संरचना को मूल रूप से चार भागों में विभाजन किया जा सकता है प्लेटी, प्रिज्म, ब्लौकी, गोलाकार में किया गया है:

  1. प्लेटी संरचना
  2. प्लेटी संरचना (Platy Structure)- इस तरह की संरचनाओं में खड़ी प्लेट्स (Horzo-ntal Plates) पट्टिका वृत तथा पतिनुमा आकृतियों विन्यासित पायी जाती है। पट्टिका वृत समुच्चय का क्षैतिज अक्ष (Horizontal axis) अधिक विकसित होने के कारण उदय कक्ष से अधिक सम्पीडित (Compressed) होते है। प्लेटी नुमा आकृतियां अधिकतर सतही तल पर वर्जन मृदाओं में अधिक मिलती है। किन्तु कभी-कभी उपमृदा संस्तर भी मुख्य देखने को मिलते है।
  3. प्रिज्मीय संरचना

प्रिज्मीय संरचना (Prismatic Structure) इस तरह की आकृतियाँ उदय कक्ष (Vertical axis) में, खम्बेनुमा प्लेट्स में उभरती है जो अलग-अलग लम्बाई में अलग-अलग मृदा में देखने को मिलती है।

इन आकृतियों का व्यास लगभग 15-20 सेन्टीमीटर के मध्य हो सकता है। इस तरह की आकृतियाँ शुष्क तथा अर्द्धशुष्क क्षेत्रों की उपमृदाओं के संस्तर (Horizones) में मिलती है। इनका विकास अच्छी तरह स्ट्रिकिंग आकार में देखने को मिलता है।

ऊपरी सतह के गोलाकार होने पर कोलुमीनार शब्दावली का उपयोग किया जाता है। इस तरह की आकृतियाँ तब बनती है जहाँ पर ऊपरी सतह गोलाकार आकृति में हो तथा नीचे के प्रोफाइल के टूटने से कुछ संस्तर में बदलाव आता है।

ऊपर की सतह समतल तथा समान धरातलीय मृदा को प्रिज्मेटिक धरातल नामकरण किया गया है। प्रिज्मेटिक एवं कोलुमिनार संरचनाओं का वर्गीकरण उनके आकार एवं संस्तर के आधार बनाकर किया गया है।

  1. ब्लॉकी संरचना (Blocky Structure)- इस तरह की आकृतियाँ मुख्य प्राकृतिक आकृतियों के टूटने, उनमें विभिन्न तरह के बदलाव आने तथा अनियमित आकृतियां बनने से प्राप्त होती है। इन आकृतियों का आकार प्रिज्मनुमा पृष्ठ भुजाकार तथा समान विन्यास की आकृतियों के जैसा पाया जाता है।

इन आकृतियों के किनारे त्रिकोणीय (Cube like) तीखे, नुकीले तथा राइटएन्गुलर आकृतियों में होते है तो ऐसी अवस्था का नामकरण ब्लोकी किया गया है। इस तरह की मृदाओं को मृदा वायु मृदाजल निकास एवं जड़ों के विकास के लिए सर्वोत्तम पाया गया है।

  1. गोलाकार संरचना (Spherical Structure)

गोलाकार संरचना (Spherical Structure) इस वर्ग में कणों का आकार गोलाकार एवं व्यास समान रूप से आधा इन्च के लगभग (1.00 सेन्टीमीटर से 1.25 सेन्टीमीटर) पाया जाता है।

इस वर्ग की आकृतियों में पानी ग्रहण करने की क्षमता कम होती है तथा एक दूसरे से आसानी पूर्वक अलग किया जा सकता है। ब्लोकी आकृति की भांति इस तरह की मृदा में पानी का अवशोषण अधिक नहीं हो सकता।

मृदा कणों की मोटाई अधिक होने के फलस्वरूप ही इनको ग्रेनुलर कहा जाता है। ग्रेनुलर तथा कार्बनिक मृदाओं में मृदा की दशा तथा मृदा संरचना उसमें उपस्थित अवयवों पर निर्भर करती है एवं मृदा अवयवों की उपस्थिति मृदा प्रबन्धन से जुड़ी हुई है।